सामान खराब निकला, पैसा वापस नहीं मिला, या सेवा वैसी नहीं मिली जैसी वादा की गई थी — इसके लिए दो अलग रास्ते हैं, और क्रम से चलना चाहिए।
| पहला कदम | राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन — 1915 |
|---|---|
| क्या है | अदालत से पहले वाला रास्ता, नि:शुल्क |
| और कैसे | WhatsApp/SMS 8800001915, NCH और UMANG ऐप, consumerhelpline.gov.in |
| दूसरा कदम | उपभोक्ता आयोग में औपचारिक शिकायत |
| कहाँ | e-jagriti.gov.in |
| समयसीमा | घटना के दो साल के भीतर |
पहले 1915 आज़माइए। बहुत से मामले वहीं निपट जाते हैं, क्योंकि हज़ार से ज़्यादा कंपनियाँ इस व्यवस्था से जुड़ी हैं और शिकायत सीधे उन तक पहुँचती है। न कोई फीस, न कोई कागज़ी कार्रवाई।
वह पोर्टल जो बदल चुका है
यह ज़रूर जान लीजिए, वरना गलत जगह पहुँचेंगे।
पहले औपचारिक शिकायत e-Daakhil पर दर्ज होती थी। अब वह व्यवस्था e-Jagriti में मिला दी गई है — और e-Jagriti के अनुसार 1 जनवरी 2025 से e-Daakhil तथा पुरानी प्रणालियाँ उसी में समाहित हो चुकी हैं।
पर इंटरनेट पर अब भी बहुत सी वेबसाइटें — 2026 की तारीख वाली भी — पुराना पता बता रही हैं।
नया काम शुरू करने के लिए e-jagriti.gov.in पर जाइए।
₹5 लाख तक कोई फीस नहीं
यह सबसे कम जानी जाने वाली बात है।
दावे की रकम के हिसाब से आयोग तय होता है, और ज़िला आयोग में सबसे नीचे वाली श्रेणी नि:शुल्क बताई गई है — यानी जिस रकम का दावा है वह एक तय सीमा तक हो, तो कोर्ट फीस नहीं लगती।
और वकील भी ज़रूरी नहीं। उपभोक्ता आयोग में आप खुद अपनी बात रख सकते हैं, और सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंस से भी हो सकती है — यानी दूसरे शहर जाने की ज़रूरत नहीं।
फीस की मौजूदा श्रेणियाँ पोर्टल पर ही दिख जाती हैं। आवेदन करते समय वहीं देख लीजिए।
पहले 1915 — क्यों
यह पूर्व-वाद (pre-litigation) व्यवस्था है। मतलब मुकदमे से पहले सुलझाने की कोशिश।
- टोल फ्री 1915 — फोन पर
- WhatsApp या SMS: 8800001915
- NCH ऐप या UMANG ऐप
consumerhelpline.gov.in
शिकायत संख्या ज़रूर लीजिए। आगे आयोग में जाना पड़े तो यही दिखाता है कि आपने पहले सुलझाने की कोशिश की थी — और वह आपके पक्ष में जाता है।
आयोग में शिकायत — क्या-क्या चाहिए
यह हिस्सा ध्यान से पढ़िए, क्योंकि अधूरे कागज़ों से आवेदन लौट आता है।
- शिकायत — तय प्रारूप में
- नोटरी से प्रमाणित शपथ पत्र — यह अनिवार्य है
- index और तारीखों की सूची
- memo of parties — दोनों पक्षों का ब्योरा
- खरीद का बिल या रसीद
- वारंटी कार्ड, अगर हो
- कंपनी से हुई बातचीत — ईमेल, मैसेज, पत्र
- खराब सामान की फोटो
- भुगतान का सबूत
- 1915 की शिकायत संख्या, अगर पहले की थी
दस्तावेज़ PDF में अपलोड होते हैं और हर फाइल की आकार सीमा होती है। स्कैन करते समय ध्यान रखिए।
शपथ पत्र सबसे ज़्यादा अटकाता है
यह नोटरी से प्रमाणित होना चाहिए। बहुत से लोग बाकी सब तैयार करके इसी पर रुक जाते हैं।
नोटरी अदालत परिसर के आसपास मिल जाते हैं और शुल्क मामूली होता है। यह काम पहले निपटा लीजिए, आखिर में नहीं।
दो साल की सीमा
शिकायत घटना के दो साल के भीतर दर्ज होनी चाहिए।
“घटना” का मतलब वह दिन जब आपको दिक्कत का पता चला या कंपनी ने मना कर दिया — जरूरी नहीं कि खरीद का दिन।
तारीखें लिखकर रखिए — कब खरीदा, कब खराबी आई, कब शिकायत की, कब कंपनी ने क्या जवाब दिया। यही सूची आगे काम आती है।
कहाँ-कहाँ लागू होता है
लोग समझते हैं कि यह सिर्फ सामान के लिए है। सेवाएँ भी इसमें आती हैं:
- ऑनलाइन ऑर्डर — गलत सामान, न आना, रिफंड न मिलना
- बिजली, पानी और टेलीफोन की सेवाएँ
- अस्पताल और निजी शिक्षा संस्थान
- बिल्डर — कब्ज़ा न देना, वादे के मुताबिक न बनाना
- ट्रैवल एजेंट और टूर पैकेज
- बीमा और बैंक — पर इनके अपने लोकपाल भी हैं
बीमा और बैंक के लिए पहले लोकपाल देखिए
इन दोनों के लिए अलग, तेज़ और नि:शुल्क व्यवस्था है:
- बीमा — बीमा भरोसा और बीमा लोकपाल
- बैंक और लोन — RBI लोकपाल
- बिजली — CGRF और विद्युत लोकपाल
पर एक बात ध्यान रखिए: अगर मामला पहले से किसी अदालत या फोरम में है, तो लोकपाल उसे नहीं सुनता। एक समय में एक ही रास्ता चुनिए।
क्या मिल सकता है
उपभोक्ता आयोग ये आदेश दे सकता है:
- सामान बदलना या ठीक करना
- पैसा वापस करना
- हुए नुकसान का मुआवज़ा
- मानसिक परेशानी के लिए मुआवज़ा
- मुकदमे का खर्च
शिकायत से पहले तीन काम
- कंपनी को लिखित में शिकायत कीजिए — ईमेल भी चलेगा। जवाब या जवाब न आना, दोनों सबूत हैं
- 1915 पर शिकायत कीजिए और संख्या लीजिए
- सारे कागज़ जुटाइए — बिल, फोटो, बातचीत, तारीखें
पहला कदम सबसे ज़्यादा लोग छोड़ देते हैं — सीधे फोन पर बहस कर लेते हैं, और कोई रिकॉर्ड नहीं बनता। ईमेल भेजिए, भले जवाब न आए।
एक चेतावनी
- 1915 और उपभोक्ता आयोग की व्यवस्था सरकारी है — मिलती-जुलती निजी साइटें मोटी फीस लेती हैं
- “केस जितवा देंगे” कहकर पहले पैसे माँगने वाले से दूर रहिए
- किसी को अपना बैंक विवरण या OTP मत दीजिए
- ठगी हो जाए तो 1930 — पहला घंटा सबसे कीमती है
स्रोत: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019; राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (consumerhelpline.gov.in), उपभोक्ता मामले विभाग, भारत सरकार; e-Jagriti पोर्टल — जिसमें e-Daakhil एवं पुरानी प्रणालियाँ 1 जनवरी 2025 से समाहित की गईं; राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) की प्रक्रिया संबंधी सार्वजनिक जानकारी।
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है, कानूनी सलाह नहीं। फीस, अधिकार क्षेत्र और प्रक्रिया दावे की रकम तथा मामले के अनुसार अलग होती है और बदलती रहती है। आवेदन से पहले e-jagriti.gov.in पर मौजूदा जानकारी देखें, या किसी योग्य अधिवक्ता से परामर्श करें। कोई त्रुटि दिखे तो vartalaapnews@gmail.com पर बताएँ।


