यह लेख अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की प्रक्रिया और उसमें तय मुआवज़े के बारे में है — तथ्य और नियम, बस इतना।
| मुआवज़ा | ₹85,000 से ₹8,25,000 तक — अपराध के हिसाब से |
|---|---|
| आधार | नियम 12(4) और अनुसूची (Annexure I), 2016 में संशोधित |
| कैसे मिलता है | किस्तों में — FIR पर, चार्जशीट पर, और फैसले पर |
| कौन देता है | ज़िला मजिस्ट्रेट / SDM — 7 दिन के भीतर व्यवस्था करनी होती है |
| जाँच कौन करेगा | DSP या उससे ऊपर का अधिकारी |
| चार्जशीट | 60 दिन के भीतर |
सबसे ज़रूरी बात पहले: मुआवज़े के लिए मुकदमे का फैसला आने तक इंतज़ार नहीं करना पड़ता। पहली किस्त FIR दर्ज होने के बाद ही मिल जाती है।
बहुत से पीड़ित परिवार यही नहीं जानते, और सालों तक कुछ नहीं माँगते।
FIR — तीन बातें जो नियम में लिखी हैं
1. कोई प्रारंभिक जाँच नहीं
अधिनियम की धारा 18A(1) साफ कहती है कि इस कानून के तहत FIR दर्ज करने से पहले कोई प्रारंभिक जाँच (preliminary inquiry) ज़रूरी नहीं है।
संज्ञेय अपराध की सूचना मिलते ही FIR दर्ज होनी चाहिए।
2. जाति प्रमाण पत्र FIR के समय ज़रूरी नहीं
प्रमाण पत्र मुकदमे और मुआवज़े के लिए चाहिए होता है — पर पुलिस सिर्फ इसलिए शिकायत दर्ज करने से मना नहीं कर सकती कि वह उस वक्त आपके पास नहीं है। वह बाद में जमा किया जा सकता है।
अगर प्रमाण पत्र नहीं है तो बनवाने की प्रक्रिया यहाँ दी है।
3. FIR की प्रति मुफ्त मिलनी चाहिए
कानून के अनुसार सूचना देने वाले या पीड़ित को FIR की प्रति नि:शुल्क दी जानी चाहिए।
वह प्रति संभालकर रखिए — मुआवज़े का दावा उसी से शुरू होता है।
पुलिस FIR दर्ज न करे तो
क्रम से कीजिए, और हर कदम लिखित में:
- लिखित शिकायत थाने में दीजिए और पावती लीजिए
- दर्ज न हो तो पुलिस अधीक्षक (SP/SSP) को लिखित में दीजिए — डाक से भेजा हो तो रसीद रखिए
- संज्ञेय अपराध की FIR दर्ज न करना अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई का आधार बन सकता है
- फिर भी न हो तो मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत का रास्ता है — इसके लिए वकील से मिलिए
पंजाब में ज़िला स्तर के नंबर — लुधियाना, जालंधर, बठिंडा — हमारे लेखों में दिए हैं।
मुआवज़ा कैसे माँगें
- FIR की प्रति लीजिए
- ज़िला समाज कल्याण अधिकारी या ज़िला मजिस्ट्रेट के कार्यालय जाइए
- जाति प्रमाण पत्र और बैंक खाते का ब्योरा दीजिए
- आवेदन की पावती लीजिए
नियम के अनुसार ज़िला मजिस्ट्रेट, SDM या कार्यकारी मजिस्ट्रेट को सात दिन के भीतर राहत की व्यवस्था करनी होती है — नकद या वस्तु के रूप में, तय अनुसूची के अनुसार।
पैसा DBT से बैंक खाते में आता है, इसलिए खाता आधार से NPCI में seeded होना चाहिए — वरना मंज़ूरी के बाद भी पैसा अटक जाता है।
देरी हो तो
नियमों का हवाला देते हुए लिखित में याद दिलाइए, और RTI से पूछा जा सकता है कि आवेदन किस स्तर पर है। RTI की फीस ₹10 है।
हर ज़िले में सतर्कता एवं निगरानी समिति भी होती है, जो ऐसे मामलों की समीक्षा करती है।
अतिरिक्त राहत
गंभीर अपराधों — हत्या, बलात्कार, आगजनी, स्थायी दिव्यांगता — के मामलों में डॉ. अंबेडकर राष्ट्रीय राहत योजना के तहत अलग से तत्काल राहत का प्रावधान बताया गया है।
यह ऊपर वाली अनुसूची से अलग है। अपने मामले में क्या लागू होता है, यह ज़िला कार्यालय या वकील से पूछिए।
मुकदमे की प्रक्रिया
| जाँच | DSP या उससे ऊपर का अधिकारी (नियम 7) |
|---|---|
| चार्जशीट | 60 दिन के भीतर, विशेष न्यायालय में |
| अदालत | विशेष न्यायालय — सत्र न्यायालय। 2015 के संशोधन के बाद विशिष्ट विशेष न्यायालय भी |
| अग्रिम ज़मानत | धारा 18 और 18A के तहत वर्जित |
2015 के संशोधन से धारा 15A जोड़ी गई, जिसमें पीड़ित और गवाहों के अधिकार लिखित रूप में दर्ज किए गए — जिनमें ज़मानत पर सुनवाई से पहले पीड़ित को सुने जाने का अधिकार भी शामिल है।
यानी ज़मानत की सुनवाई में आपका पक्ष सुना जाना चाहिए। यह हक बहुत कम इस्तेमाल होता है।
मुफ्त कानूनी सहायता
वकील का खर्च एक बड़ी रुकावट होती है — और इसका हल मौजूद है।
विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम के तहत अनुसूचित जाति और जनजाति के सदस्य नि:शुल्क कानूनी सहायता के पात्र हैं।
- राष्ट्रीय हेल्पलाइन: 15100
- हर ज़िले में ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) — अदालत परिसर में
यहाँ वकील सरकार की तरफ से मिलता है और कोई फीस नहीं लगती।
कागज़ संभालकर रखिए
- FIR की प्रति
- हर शिकायत की पावती और तारीख
- मेडिकल रिपोर्ट, अगर लागू हो
- जाति प्रमाण पत्र
- मुआवज़े के आवेदन की पावती
- गवाहों के नाम और संपर्क
हर कागज़ की स्कैन कॉपी भी रख लीजिए — मूल खो जाए तो भी काम चलता रहे।
एक ज़रूरी बात
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है, कानूनी सलाह नहीं।
यह एक आपराधिक कानून है और हर मामले के तथ्य अलग होते हैं। मुआवज़े की सटीक रकम अपराध की धारा पर निर्भर करती है, और अनुसूची में हर धारा के लिए अलग रकम दी गई है।
अपने मामले के लिए वकील से ज़रूर मिलिए — और अगर खर्च की दिक्कत है तो 15100 या ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण से नि:शुल्क सहायता लीजिए।
एक चेतावनी
- FIR दर्ज कराने या मुआवज़े के आवेदन की कोई फीस नहीं — किसी बिचौलिए को पैसे मत दीजिए
- “केस मज़बूत करा देंगे” या “मुआवज़ा दिलवा देंगे” कहने वाले से दूर रहिए
- मुआवज़ा सीधे बैंक खाते में आता है, किसी के हाथ से नहीं
- ठगी हो जाए तो 1930 — पहला घंटा सबसे कीमती है
स्रोत: अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 एवं उसके अंतर्गत बने नियम, 1995 — विशेषकर नियम 7, नियम 12(4) तथा अनुसूची (Annexure I), 2016 में संशोधित; अधिनियम की धारा 14, 15A, 18 एवं 18A; 2015 का संशोधन अधिनियम; विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987।
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और किसी भी रूप में कानूनी सलाह नहीं है। मुआवज़े की राशि, प्रक्रिया और समयसीमा राज्य तथा मामले के अनुसार अलग हो सकती है, और नियम संशोधित होते रहते हैं। अपने मामले के लिए योग्य अधिवक्ता या ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण से परामर्श अवश्य करें। कोई त्रुटि दिखे तो vartalaapnews@gmail.com पर बताएँ।


