परिवार में किसी की मृत्यु के बाद कागज़ी कार्रवाई सबसे आखिरी चीज़ होती है जिसके बारे में कोई सोचना चाहता है। लेकिन मृत्यु प्रमाण पत्र के बिना बीमा का दावा, पेंशन, बैंक खाते का निपटारा, संपत्ति का हस्तांतरण — कुछ भी आगे नहीं बढ़ता।
और जितनी देर होती जाती है, प्रक्रिया उतनी ही कठिन होती जाती है।
21 दिन का नियम
जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1969 की धारा 12 के अनुसार भारत में हुई हर मृत्यु की सूचना संबंधित रजिस्ट्रार को 21 दिन के भीतर देनी अनिवार्य है। इस अवधि में रजिस्ट्रेशन नि:शुल्क होता है।
सूचना देने की ज़िम्मेदारी इस पर निर्भर करती है कि मृत्यु कहाँ हुई:
- घर पर: परिवार का मुखिया या निकटतम संबंधी
- अस्पताल में: अस्पताल का प्रभारी अधिकारी
- जेल में: जेल प्रभारी
- सार्वजनिक स्थान पर: स्थानीय पुलिस या ग्राम पंचायत प्रधान
ज़रूरी दस्तावेज़
- मृत्यु का चिकित्सा प्रमाण पत्र (अस्पताल में हुई मृत्यु के मामले में)
- श्मशान या कब्रिस्तान की रसीद
- मृतक का पहचान पत्र — आधार, वोटर आईडी या राशन कार्ड
- सूचना देने वाले का पहचान पत्र और पते का प्रमाण
- निर्धारित आवेदन फॉर्म, विधिवत भरा हुआ
2023 के संशोधन के बाद सभी चिकित्सा संस्थानों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि वे मृत्यु के कारण का प्रमाण पत्र रजिस्ट्रार को दें और उसकी एक प्रति निकटतम संबंधी को भी सौंपें। अस्पताल से यह प्रति लेना न भूलें — बाद में यही सबसे ज़रूरी कागज़ साबित होता है।
देरी हो जाए तो — धारा 13 के तीन चरण
1. 21 से 30 दिन के बीच
रजिस्ट्रेशन हो जाता है, बस निर्धारित विलंब शुल्क देना होता है। यह शुल्क राज्य सरकार तय करती है और आमतौर पर मामूली होता है।
2. 30 दिन से एक साल के बीच
इसके लिए ज़िला रजिस्ट्रार या निर्धारित अधिकारी की लिखित अनुमति चाहिए, साथ में तय शुल्क और सहायक दस्तावेज़।
3. एक साल से ज़्यादा देरी
अब रजिस्ट्रेशन मजिस्ट्रेट के आदेश पर ही होगा। इसमें आमतौर पर लगता है:
- रजिस्ट्रार को लिखित आवेदन, जिसमें देरी का कारण स्पष्ट हो
- गैर-न्यायिक स्टाम्प पेपर पर शपथ पत्र
- प्रथम श्रेणी या कार्यकारी मजिस्ट्रेट का आदेश
- मूल चिकित्सा प्रमाण पत्र या दाह-संस्कार की रसीद
- दो गवाहों के शपथ पत्र
- निवास का प्रमाण
एक राहत की बात: 21 दिन में रजिस्ट्रेशन न कराने पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलता। लेकिन व्यावहारिक दिक्कतें बहुत हैं — बीमा और पेंशन के दावे तब तक अटके रहते हैं।
जुलाई 2026 का प्रस्तावित बदलाव
29 जुलाई 2026 को लोकसभा में जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश हुआ है। इसमें प्रस्ताव है कि दो साल से ज़्यादा देरी से दर्ज कराए जाने वाले मामले आपराधिक अदालत के दायरे में आएँ।
यह अभी विधेयक है, कानून नहीं — संसद से पारित होने और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ही लागू होगा। लेकिन संकेत साफ है: देरी पर सख्ती बढ़ेगी, घटेगी नहीं।
एक व्यावहारिक सलाह
प्रमाण पत्र की कम से कम 5-6 प्रतियाँ बनवा लें। बीमा कंपनी, बैंक, पेंशन कार्यालय, संपत्ति रजिस्ट्री, LPG कनेक्शन — हर जगह मूल या प्रमाणित प्रति माँगी जाती है, और ज़्यादातर वापस नहीं करते। बाद में एक-एक प्रति के लिए दोबारा चक्कर लगाने से बेहतर है कि शुरू में ही बनवा लें।
कहाँ आवेदन करें
- शहरी क्षेत्र: नगर निगम या नगर परिषद का जन्म-मृत्यु रजिस्ट्रार कार्यालय
- ग्रामीण क्षेत्र: ग्राम पंचायत सचिव या ब्लॉक स्तर का रजिस्ट्रार
- ऑनलाइन: केंद्र सरकार का सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम पोर्टल (crsorgi.gov.in)
विलंब शुल्क और कार्यालय का समय हर नगर निगम में अलग है — लुधियाना, जालंधर, अमृतसर, पटियाला सबकी दरें अलग हो सकती हैं। जाने से पहले पुष्टि कर लें।
ठगी से बचें
शोक के समय परिवार सबसे कमज़ोर स्थिति में होता है, और यही वह वक्त है जब बिचौलिए सक्रिय होते हैं। पूरी प्रक्रिया सरकारी है और इसमें किसी एजेंट की ज़रूरत नहीं। किसी अनजान वेबसाइट पर मृतक का आधार नंबर या भुगतान की जानकारी न डालें।
स्रोत: जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1969 (धारा 12 एवं 13) — India Code; जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण (संशोधन) अधिनियम, 2023; जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026; नागरिक पंजीकरण प्रणाली (CRS), भारत सरकार।
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। शुल्क, दस्तावेज़ों की सूची और स्थानीय प्रक्रिया बदल सकती है — आवेदन से पहले संबंधित कार्यालय से पुष्टि करें। कोई त्रुटि दिखे तो vartalaapnews@gmail.com पर सूचित करें।


