खाते में पैसे कम पड़ गए, EMI कट नहीं पाई — और उसी दिन से घबराहट शुरू हो जाती है कि अब CIBIL खराब हो जाएगा।
ऐसा तुरंत नहीं होता। और यही वह बात है जो सबसे ज़्यादा काम आती है।
असली बात — 30 दिन की खिड़की
EMI बाउंस होते ही वह क्रेडिट ब्यूरो में दर्ज नहीं हो जाती।
बैंक और NBFC क्रेडिट ब्यूरो को नियमित अंतराल पर जानकारी भेजते हैं, और असली नुकसान तब होता है जब भुगतान 30 दिन से ज़्यादा बकाया रह जाए — तब वह DPD (Days Past Due) के रूप में दर्ज होता है।
| कब चुकाया | क्या होता है |
|---|---|
| कुछ दिनों में | बाउंस शुल्क लगेगा, पर स्कोर पर असर आमतौर पर नहीं |
| 30 दिन से ज़्यादा | ब्यूरो में दर्ज — स्कोर गिरता है |
| 90 दिन | खाता NPA घोषित, वसूली की कार्रवाई |
यानी बाउंस होते ही सब खत्म नहीं हो जाता। अगर आप जल्दी भर देते हैं, तो शुल्क तो लगेगा पर स्कोर बच जाता है।
यह खिड़की गँवाइए मत। बाउंस का SMS आते ही अगले कुछ दिनों में पूरा बकाया — EMI और शुल्क दोनों — जमा कर दीजिए।
और एक बात
DPD का निशान एक बार दर्ज हो जाए तो 36 महीने तक रिपोर्ट में रहता है। लोन बंद कर देने से भी नहीं हटता।
इसीलिए 30 दिन की खिड़की इतनी कीमती है — उसके बाद तीन साल तक निशान रहता है।
खर्च कितना आता है — दो जगह लगता है
लोग एक ही शुल्क का हिसाब लगाते हैं, जबकि दो अलग जगह से कटता है:
- आपका बैंक — NACH या ऑटो-डेबिट फेल होने का शुल्क
- आपका लेंडर — बाउंस शुल्क और जुर्माना
एक बाउंस पर कुल मिलाकर कुछ हज़ार रुपये तक चला जाता है — जितना लोग सोचते हैं उससे कहीं ज़्यादा।
सटीक रकम हर बैंक और लेंडर में अलग होती है। अपने लोन एग्रीमेंट या schedule of charges में देख लीजिए।
RBI का वह नियम जो आपके हक में है
यह जान लीजिए, क्योंकि इससे आप जाँच सकते हैं कि लेंडर सही चार्ज कर रहा है या नहीं।
पहले लेंडर देरी पर penal interest लगाते थे — यानी आपकी ब्याज दर में ही कुछ प्रतिशत जोड़ देते थे। इससे जुर्माना ब्याज में घुल जाता था और अलग से दिखता ही नहीं था।
अब RBI के दिशानिर्देशों के अनुसार — जुर्माना penal charges के रूप में लगता है, यानी:
- यह ब्याज दर में नहीं जोड़ा जा सकता
- अलग से दिखाना पड़ता है
- इस पर आगे ब्याज नहीं लगाया जा सकता
अपना स्टेटमेंट देखिए। अगर जुर्माना ब्याज में जुड़ा दिख रहा है, तो लेंडर से लिखित में स्पष्टीकरण माँगिए। यही आपके सवाल का आधार है।
चेक बाउंस और NACH बाउंस — फर्क समझ लीजिए
यह फर्क बहुत ज़रूरी है और ज़्यादातर जगह गड्डमड्ड कर दिया जाता है।
| NACH / ऑटो-डेबिट फेल | शुल्क और जुर्माना लगेगा। धारा 138 लागू नहीं होती |
|---|---|
| भौतिक चेक बाउंस | ऊपर सब कुछ, और धारा 138 का रास्ता भी खुल जाता है |
आजकल ज़्यादातर EMI NACH या ऑटो-डेबिट से कटती है, चेक से नहीं। तो अगर आपकी EMI NACH से है, तो धारा 138 वाला डर आप पर लागू नहीं होता।
अगर चेक से है तो
परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के तहत:
- चेक बाउंस होने पर लेनदार 30 दिन के भीतर कानूनी नोटिस भेज सकता है
- नोटिस मिलने के बाद आपके पास 15 दिन होते हैं भुगतान करने के
- 15 दिन में न भरें तो 30 दिन के भीतर अदालत में शिकायत दायर हो सकती है
- दोष सिद्ध होने पर दो साल तक की कैद, या चेक की रकम से दोगुना जुर्माना, या दोनों
पर ध्यान दीजिए — नोटिस के बाद 15 दिन की खिड़की मिलती है। उसमें भर देने पर मामला वहीं खत्म हो जाता है। यह दूसरी कीमती खिड़की है।
एक बात जो चेक वालों को नहीं पता
चेक बाउंस होने पर दोनों पक्षों से शुल्क कटता है — जिसने चेक दिया उससे भी, और जिसने जमा किया उससे भी।
एक ही चेक, दो कटौतियाँ। और जमा करने वाले को अकसर पता ही नहीं चलता कि उसका भी पैसा कटा।
अगर गलती बैंक की हो
यह भी होता है — खाते में पैसे थे, फिर भी तकनीकी वजह से डेबिट फेल हो गया।
ऐसे में:
- उस दिन का बैंक स्टेटमेंट निकालिए, जिसमें बैलेंस दिख रहा हो
- बैंक में लिखित शिकायत दीजिए और शुल्क वापसी माँगिए
- बात न बने तो RBI लोकपाल —
cms.rbi.org.in, नि:शुल्क
और लेंडर से लिखित में कहिए कि यह चूक आपकी नहीं थी — ताकि ब्यूरो में गलत entry न जाए। अगर चली गई हो तो क्रेडिट रिपोर्ट में शिकायत का रास्ता है, और 30 दिन में समाधान न हो तो ₹100 प्रतिदिन मुआवज़े का प्रावधान भी।
बाउंस हो जाए तो क्रम से
- घबराइए मत — एक बाउंस से CIBIL खत्म नहीं होता
- लेंडर को खुद फोन कीजिए — इंतज़ार मत कीजिए कि वे करें
- पूरा बकाया जल्दी भरिए — EMI और शुल्क दोनों
- 30 दिन की खिड़की के भीतर निपटा दीजिए
- कुछ हफ्तों बाद क्रेडिट रिपोर्ट जाँचिए कि कोई गलत entry तो नहीं गई
अगर तंगी लंबी चलने वाली है
बार-बार बाउंस होने देने से बेहतर है कि लेंडर से खुद बात कीजिए। EMI की तारीख बदलना, अवधि बढ़ाकर किस्त घटाना, या अस्थायी राहत — ये विकल्प मौजूद होते हैं।
लेंडर के लिए भी NPA बनने से बेहतर है कि पैसा आता रहे। पर यह बातचीत बाउंस से पहले करनी होती है, बाद में नहीं।
वसूली एजेंट के बारे में
RBI के दिशानिर्देशों के अनुसार वसूली एजेंट:
- सुबह 8 से शाम 7 बजे के बीच ही संपर्क कर सकते हैं
- धमकी, अपमान या सार्वजनिक बदनामी नहीं कर सकते
- परिवार, पड़ोसियों या दफ्तर में जाकर बेइज़्ज़ती नहीं कर सकते
ऐसा हो तो लेंडर के नोडल अधिकारी को लिखित शिकायत कीजिए, और फिर RBI लोकपाल को। कर्ज़ लेना अपराध नहीं है — और बदसलूकी सहना आपकी मजबूरी नहीं है।
एक चेतावनी
- “CIBIL ठीक करा देंगे” या “बाउंस हटवा देंगे” — कोई नहीं कर सकता। असली entry हटती नहीं
- किसी को अपना लोन खाता विवरण, नेट बैंकिंग या OTP मत दीजिए
- भुगतान सिर्फ लेंडर के आधिकारिक चैनल से कीजिए — किसी एजेंट के निजी खाते में नहीं
- ठगी हो जाए तो 1930 — पहला घंटा सबसे कीमती है
और लोन पूरा चुक जाने पर NOC और मूल कागज़ ज़रूर लीजिए — 30 दिन में न मिलें तो ₹5,000 प्रतिदिन मुआवज़े का प्रावधान है।
स्रोत: भारतीय रिज़र्व बैंक के penal charges संबंधी दिशानिर्देश एवं वसूली एजेंटों संबंधी निर्देश; परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138; क्रेडिट ब्यूरो रिपोर्टिंग एवं DPD संबंधी सार्वजनिक जानकारी; RBI का शिकायत पोर्टल (cms.rbi.org.in)।
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है, कानूनी या वित्तीय सलाह नहीं। शुल्क, जुर्माना और रिपोर्टिंग की प्रक्रिया हर लेंडर में अलग होती है। अपने लोन एग्रीमेंट की शर्तें और लेंडर की schedule of charges अवश्य देखें। कोई त्रुटि दिखे तो vartalaapnews@gmail.com पर बताएँ।

